The Existentialist
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रंग है दिल का मेरे / फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तुम न आए थे तो हर चीज़ वही थी कि जो है 
आसमाँ हद्दे-नज़र, राहगुज़र राहगुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय 
और अब शीशा-ए-मय, राहगुज़र, रंगे-फ़लक 
रंग है दिल का मेरे “ख़ून-ए-जिगर होने तक” 
चंपई रंग कभी, राहते-दीदार का रंग
सुरमई रंग की है सा’अते-बेज़ार का रंग
ज़र्द पत्तों का, खस-ओ-ख़ार का रंग 
सुर्ख़ फूलों का, दहकते हुए गुलज़ार का रंग
ज़हर का रंग, लहू-रंग, शबे-तार का रंग
आसमाँ, राहगुज़र, शीशा-ए-मय
कोई भीगा हुआ दामन, कोई दुखती हुई रग
कोई हर लहज़ा बदलता हुआ आईना है
अब जो आए हो तो ठहरो कि कोई रंग, कोई रुत, कोई शै 
एक जगह पर ठहरे 
फिर से इक बार हर इक चीज़ वही हो कि जो है 
आसमाँ हद्दे-नज़र, राहगुज़र राहगुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय 

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overdose-art:

Art History Meme : [2/6] Themes in Van Gogh’s work

 Still Life, Flowers

  • Irises (1889)
  • Basket of Pansies (1887)
  • Wild Roses (1890)
  • Almond Blossom (1890)
  • Vase with Twelve Sunflowers (1889)
  • Butterflies and Poppies (1890)

overdose-art:

Art History Meme : [2/6] Themes in Van Gogh’s work

 Still Life, Flowers

  • Irises (1889)
  • Basket of Pansies (1887)
  • Wild Roses (1890)
  • Almond Blossom (1890)
  • Vase with Twelve Sunflowers (1889)
  • Butterflies and Poppies (1890)

Source overdose-art
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It seems to me sometimes that I do not really exist, but that I merely imagine I exist. The thing that I have the greatest difficulty in believing in, is my own reality. I am constantly getting outside myself, and as I watch myself act I cannot understand how a person who acts is the same as the person who is watching him act, and who wonders in astonishment and doubt how he can be an actor and a watcher at the same moment.

— André GideThe Counterfeiters (1925)
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magictransistor:

Andy Warhol. Electric Chair. 1971.

Warhol began using the image of the electric chair in 1963, the same year as the two final executions in New York State. Over the next decade, he repeatedly returned to the subject, reflecting the political controversy surrounding the death penalty in America in the 1960s. The chair, and its brutal reduction of life to nothingness, is given a typically deadpan presentation by Warhol. -Tate

magictransistor:

Andy Warhol. Electric Chair. 1971.

Warhol began using the image of the electric chair in 1963, the same year as the two final executions in New York State. Over the next decade, he repeatedly returned to the subject, reflecting the political controversy surrounding the death penalty in America in the 1960s. The chair, and its brutal reduction of life to nothingness, is given a typically deadpan presentation by Warhol. -Tate

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गुलों में रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले / फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

गुलों में रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का करोबार चले

क़फ़स उदास है यारो, सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

कभी तो सुब्ह तेरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्क-ए-बार चले

बड़ा है दर्द का रिश्ता, ये दिल ग़रीब सही
तुम्हारे नाम पे आयेंगे ग़मगुसार चले

जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब -ए-हिज्राँ
हमारे अश्क तेरी आक़बत सँवार चले

हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूँ की तलब
गिरह में ले के गरेबाँ का तार-तार चले

मक़ाम ‘फैज़’ कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले

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मेरे हमदम मेरे दोस्त / फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


गर मुझे इसका यकीं हो मेरे हमदम मेरे दोस्त

गर मुझे इसका यकीं हो कि तेरे दिल की थकन

तेरी आंखों की उदासी,तेरे सीने की जलन

मेरी दिलजोई मेरे प्यार से मिट जायेगी,

गर मेरा हर्फ़-ऐ-तसल्ली वो दवा हो जिससे

जी उठे फिर तेरा उजडा हुआ बेनूर दिमाग

तेरी पेशानी से धुल जायें ये तजलील के दाग़

तेरी बीमार जवानी को शफा हो जाए

गर मुझे इस का यकीं हो मेरे हमदम मेरे दोस्त

रोज़-ओ-शब् शाम-ओ-सहर मैं तुझे बहलाता रहूँ

मैं तुझे गीत सुनाता रहूँ, हलके-शीरीं

आबशारों के, बहारों के, चमन जारों के गीत

आमद-ऐ-सुबह के, माहताब के, सय्यारों के गीत

तुझ से मैं हुस्न-ओ-मोहब्बत की हकायात करूँ,

कैसे मगरूर हसीनाओं के बर्फाब से जिस्म

गर्म हाथों की हरारत में पिघल जाते हैं।

कैसे इक चेहरे के ठहरे हुए मानूस नकूस

देखते देखते यकलख्त बदल जाते हैं

किस तरह आरिज़े -महबूब का शफ्फाफ़ बिल्लौर

यक- ब- यक बादए- अह्मर से दहक जाता है

कैसे गुलचीं के लिए झुकती है ख़ुद शाख-ए-गुलाब

किस तरह रात का ईवान महक जाता है


यूँ ही गाता रहूँ गाता रहूँ तेरी खातिर

गीत बुनता रहूँ बैठा रहूँ तेरी खातिर

पर मेरे गीत तेरे दुख का मदावा ही नहीं

नगमा-ए-ज़र्राह नहीं, मूनिस-ओ-ग़मख़्वार सही

गीत नश्तर तो नहीं मरहम-ऐ-आज़ार सही

तेरे आज़ार का चारा नहीं नश्तर के सिवा

और ये शफ्फाक  मसीहा मेरे क़ब्जे में नहीं

इस जहाँ के किसी जी रूह के क़ब्जे में नहीं

हाँ मगर तेरे सिवा तेरे सिवा तेरे सिवा ।

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